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‘स्वतंत्रता के इस युद्ध में विजय हमारी होगी’… नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रेरणादायक कहानी

अगर अपने परिवार की प्रसन्नता के आधार पर हम अपने आदर्श निर्धारित करें, तो क्या यह ठीक होगा.

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Subhash Chandra Bose

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’… जय हिन्द!… ये ऐसे नारे है जो आज भी हमारे दिल को देशभक्ति के जज्बे से भर देते है. आज हम एक ऐसे नेता के बारे में बात करने जा रहे है जिसको ये तो नहीं मालूम था कि वो स्वतंत्रता के युद्ध में जीवित बचेगा या नहीं लेकिन इस बात पर पूरा भरोसा था कि अंत में विजय हमारी ही होगी. जिसने भारत को आज़ादी दिलाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी. जिसने भारतीय राष्ट्रीय सेना का निर्माण किया, जिसे  ‘आजाद हिन्द फ़ौज़’ के नाम से भी जाना जाता है. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि हम नेता जी सुभाष चंद्र बोस  के बारे में बात कर रहें हैं.

आज़ादी के पहले का मंज़र ही कुछ था और आज आज़ादी के इतने साल बाद का कुछ और. तब भी हम जैसे ही लोग थे, लेकिन उनकी और हमारी सोच में बहुत फर्क है. आज़ादी की लड़ाई में बहुत से ऐसे भी किरदार होंगे जो लोगों के सामने नहीं आए, इतना ही नहीं उनकी मेहनत का इतिहास के पन्नों में कहीं ज़िक्र भी नहीं होगा. उन्होंने भी आज़ाद भारत का ही सपना देखा होगा.

खैर यहां बात नेता जी की हो रही है. आपने इनके बारे में बचपन से बहुत कुछ पढ़ा होगा. इनका बचपन किस तरह बीता, किस तरह ये राजनीति में आए, राष्ट्र के लिए इनकी भावना और बहुत सी चीजें. इनका एकमात्र उद्देश भारत की आज़ादी था. तो आइए जानते हैं बोस के बारे में कुछ ख़ास-

Bose

सिविल सर्विस पद से दिया था त्याग पत्र :

– ये बात उन दिनों की है, जब सुभाष चन्द्र बोस नेता जी के नाम से जाने जाते थे. भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी इण्डियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज यूनिवर्सिटी भेज दिया और उन्होंने सिविल सर्विस में चौथा स्थान प्राप्त किया.

बोस को सिविल सर्विस रास नहीं आ रही थी जिसका कारण भारत में बढ़ती राजनैतिक गतिविधियां थी. नेता जी ने बिना सोचे समझे सिविल सर्विस से त्याग पत्र दे दिया. बोस के आईसीएस का पद ठुकराने पर उनके पिता बहुत दुखी हुए और दुःख के कारण बीमार रहने लगे. जब उनके बड़े भाई शरद चन्द्र ने उनकी ये हालत देखी, तो उन्होंने नेता जी को एक पत्र लिखा-

“पिताजी तुम्हारे फैसले से बहुत दुखी हैं. आवेश में आकर तुमने यह फैसला करने से पहले पिताजी से सलाह क्यों नहीं की?”

Subhas Chandra Bose with leaders of Bengal Congress

पत्र पढ़कर सुभाष को बहुत दुःख हुआ. उन्होंने अपने बड़े भाई शरद चन्द्र बोस को पत्र लिखा.

“पिताजी की नाराज़गी जायज़ है, मगर इंग्लैंड के राजा के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेना मेरे लिए संभव  नहीं था. मैं खुद को देश की सेवा में समर्पित कर देना चाहता हूँ. मैं हर तरह की मुश्किलों के लिए तैयार हूँ, चाहे वह निर्धनता, अभाव, माता पिता की अप्रसन्नता हो या कुछ और मैं सब सहने के लिए तैयार हूँ”

इसके जबाब में शरद चन्द्र ने सुभाष को पत्र लिखा-

पिताजी रात-रात भर सोते नहीं हैं इस चिंता में कि भारत आते ही तुम्हें गिरफ्तार कर लिया जायेगा. सरकार तुम्हारी गतिविधियों पर कार्यवाही जरुर करेगी अब तुम्हे स्वतंत्र नहीं रहने देगी.

 

यह पत्र नेता जी के दोस्त दिलीप राय ने भी पढ़ा. और बोस को त्याग पत्र वापिस लेने कि सलाह दी. ऐसा सुनकर नेताजी बोले,

मैं जानता हूँ, इस बात का मुझे भी खेद है, लेकिन अगर अपने परिवार की प्रसन्नता के आधार पर हम अपने आदर्श निर्धारित करें, तो क्या यह ठीक होगा.

यह बात सुनकर राय दंग रह गए. सुभाष तुम धन्य हो और वो माता- पिता भी जिन्होंने तुम जैसे पुत्र को जन्म दिया जो देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार है. तो ये नेताजी का देश की सेवा के लिए पहला कदम था. जिसमें इन्होंने अपने परिवार और अपनी परवाह नहीं की.

Netaji

नेता जी ने दुर्गा मां की पूजा न करके इनकी पूजा की बात कही

नेता जी के कॉलेज के समय की बात है. पूरा बंगाल भारी बाढ़ से पीड़ित था. सारा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था. नेताजी कुछ स्वयंसेवियों के साथ मिलकर बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत सामग्री इकट्ठा करने में जुट गए. वे अपने आराम को भूल दिन-रात इसमें लगे रहते. एक दिन उनके पिता बोले, ‘बेटा, क्या आज भी बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए जा रहे हो?’ सुभाष बोले, ‘जी पिताजी, मेरा जाना जरूरी है. मुझसे लोगों का दर्द बर्दाश्त नहीं होता. मैंने इस बाढ़ से तबाही का ऐसा मंजर देखा है कि आंखों से आंसू नहीं सूखते.

पिताजी बोले, ‘बेटा… मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह सहमत हूं. तुम मानव सेवा अवश्य करो, लेकिन थोड़ा घर पर भी ध्यान दिया करो. अपने गांव में मां दुर्गा की विशाल पूजा का आयोजन किया जा रहा है. वहां और लोगों के साथ तुम्हारा रहना भी जरूरी है, इसलिए तुम्हें मेरे साथ चलना होगा.

पिताजी की बात सुनकर सुभाष बोले, ‘माफ कीजिए, मैं आपके साथ नहीं चल सकता. आप सब गांव जाकर दुर्गा मां की पूजा करें. मैं दीन-दुखियों की पूजा करूंगा.

उनकी पूजा करके मुझे दुर्गा मां की पूजा का पुण्य मिल जाएगा. बेटे की बात सुनकर पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो गया. उन्होंने सुभाष को गले लगा लिया. देश के साथ ही साथ मानव सेवा का धर्म भी नेताजी ने बाखूबी निभाया.

Subhas with Emile
सुभाष चंद्र बोस अपनी पत्नी के साथ

अंतिम सांस तक निभाया प्यार

सुभाष चंद्र बोस की प्रेम कहानी भी काफी दिलचस्प रही थी. फरवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब नेताजी जेल में बंद थे तो उनकी तबीयत खराब होने लगी थी. तब ब्रिटिश सरकार ने उनको इलाज के लिए यूरोप भेजा. इलाज के दौरान एक यूरोपीय प्रकाशक ने उन्हें एक किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने की जिम्मेदारी सौंपी. उसके बाद उन्हें एक ऐसे सहयोगी की जरूरत पड़ी, जिसे अच्छी अंग्रेजी और टाइपिंग आती हो. तो उनके दोस्त ने दो लोगों को उनके पास नौकरी के लिए भेजा. इस इंटरव्यू के दौरान उन्हें ऑस्ट्रिया के एक कैथोलिक परिवार की एक खूबसूरत युवती एमिली शेंकल मिली. उनके पिता एक पशु चिकित्सक थे. नेताजी एमिली से बहुत प्रभावित हुए और उनके साथ काम करना शुरू कर दिया.

कुछ समय बाद वो एमिली की ओर आकर्षित होने लगे और दोनों में प्रेम हो गया. नेताजी ने 26 दिसम्बर 1937 को आस्ट्रिया में ही हिन्दू रिवाज से एमिली से शादी की. बताया जाता है कि दोनों ने ये फैसला लिया था कि देश की आज़ादी से पहले किसी से भी शादी का जिक्र नहीं करेंगे, जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू इस शादी के बारे में जानते थे. कुछ इतिहासकार ऐसा भी मानते हैं कि दोनों ने 1942 में शादी की थी. नवंबर 1942 में बोस और एमिली की बेटी अनिता का जन्म हुआ था. जो फिलहाल जर्मनी में अपने परिवार के साथ रहती हैं.

बोस की मौत आज भी है एक रहस्य

नेताजी को अपने जीवन में कुल 11 बार जेल की सजा दी गई थी. सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 को छह महीने का कारावास दिया गया था. 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कोलकाता की अदालत में पेश होना था, तभी वे अपना घर छोड़ जर्मनी पहुंच गए. जर्मनी में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की. अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा भी दिया. नेताजी की मृत्यु के संबंध में कई दशकों से यही दावा किया जाता रहा है कि 18 अगस्त 1945 को सिंगापुर से टोक्यो, जापान जाते समय ताइवान के पास फार्मोसा में उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. उस हवाई दुर्घटना में ही नेता जी का निधन हो गया. हालांकि, उनका पार्थिव शरीर कभी नहीं मिला, जिसकी वजह से नेताजी की मौत आज भी एक रहस्य बन कर रह गयी है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक हैं. आजादी की लड़ाई में दिए गए योगदान के लिए सुभाष चंद्र बोस को आज भी याद किया जाता है और आगे भी याद किया जाएगा.

 

 

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