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पंजाब यूनिवर्सिटी में शेरनी ‘कनुप्रिया’ का बोलबाला! जानें इनके बारे में…

महज 22 साल की उम्र में कनुप्रिया पंजाब के लिए एक मिसाल बन गयी हैं. इन्होंने वहां जीत हासिल की जहां पर लड़कियां अपनी बात ठीक से नहीं कह सकती

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Kanupriya_Punjab University

पंजाब यूनिवर्सिटी में शेरनी ‘कनुप्रिया’ का बोलबाला! जानें इनके बारे में…

समाज पुरुष प्रधान है या महिला प्रधान – इस मुद्दे पर बहुत चर्चाएं हुई है और ज्यादातर यही निष्कर्ष निकल कर आया है कि आज भी पुरुष प्रधानता की तरफ समाज का पलड़ा झुका हुआ है. समाज में आज एक 18 साल के लड़के को मैच्योर माना जाता है, ठीक उसी तरह 18 साल की लड़कियां भी समान रूप से मैच्योर हैं. जनता के मुद्दों को उठाना, किसानों के लिए काम करना, मजदूरों की समस्याओं को समझना, अपने वक्त से मुठभेड़ करना, युवाओं को गलत प्रेरणा देने से बचाना, हर जागे हुए इंसान का फर्ज है. ऐसी सोच रखने वाली कनुप्रिया ने पंजाब यूनिवर्सिटी,चंडीगढ़ में इतिहास रच दिया है. पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार, पुरुषों के बीच कोई लड़की छात्र संघ की अध्यक्ष बनी और उसकी पार्टी एफएसएस यानी स्टूडेंट फॉर सोसायटी ने भी पहली बार जीत दर्ज की. आइए जानिए पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संघ काउंसिल की अध्यक्ष कनुप्रिया के बारे में-

पहली महिला अध्यक्ष बन रचा इतिहास

महज 22 साल की उम्र में कनुप्रिया पंजाब के लिए एक मिसाल बन गयी हैं. इन्होंने वहां जीत हासिल की जहां पर लड़कियां अपनी बात ठीक से नहीं कह सकती. कनुप्रिया 719 वोटों से जीत हासिल करते हुए पार्टी की उम्मीदों पर खरी उतरीं हैं. ये पंजाब यूनिवर्सिटी में ही एमएससी जूलॉजी, सेकेंड ईयर की स्टूडेंट हैं और कैंपस में छात्र नेता के तौर पर खास पहचान रखती हैं.

कनुप्रिया साल 2014 में पंजाब यूनिवर्सिटी आई थी तभी से ये एसएफएस के साथ जुड़ी हुई हैं. 2015 से वो पार्टी की गतिविधियों में एक कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रही हैं. इनसे पहले पार्टी ने अमनदीप कौर को अपना उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाई थीं.

तरनतारन से चंडीगढ़ तक का सफर रहा बहुत खास

कनुप्रिया पंजाब के पट्टी, तरनतारन की रहने वाली हैं. इन्होंने यही से स्कूली शिक्षा ली और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई के लिए आयी. पंजाब के तरनतारन जिले के पट्टी में व्यवसायी पवन कुमार और नर्स चंद्र सुधा रानी की लाडली बेटी हैं. कनुप्रिया ने कभी ऐसा सोचा नहीं था की इस यूनिवर्सिटी में आकर उनकी लाइफ बदल जाएगी. शुरू से ही ये काफी कॉन्फिडेंट और पढ़ाई में तेज रही हैं, यही लक्षण उन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी में इतिहास बनाने में मददगार साबित हुए है.

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Source : Indian Express

जीत के लिए सही मुद्दे है जरुरी:

कनुप्रिया के दोस्तों का कहना है कि वो इस जीत को एक आदमी की दुनिया में एक महिला की जीत के रूप में देखते हैं. वहीं कुछ लोग प्रगतिशील सोच की जीत के रूप में देखते हैं. लेकिन कनुप्रिया का मानना है कि उन्हें जीतने पर भरोसा था क्योंकि ये मुद्दों पर विश्वास करतीं है. किसी भी जीत के लिए सही मुद्दे का होना जरुरी है.

कपड़ों पर अटकी इस मानसिकता को बदलने की जरूरत
एक ऐसी जगह जहां लड़कियों के लिए एक नोटिस लगाया जाता है, जिसमें लिखा जाता है कैसे कॉमन रूम, डाइनिंग हॉल या फिर हॉस्टल ऑफिस में जाने से पहले लड़कियों को सही कपड़े पहनने चाहिए जिसके बाद ही वह कमरे से बाहर निकल सकती है. वहीं अगर लड़कियां ड्रेस कोड फॉलो नहीं करती है तो उन्हें चेतावनी दी जाती है और कहा जाता है उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है. कैंपस में हमेशा से लड़कियों को यह कह कर चुप करवा दिया जाता है, लेकिन क्या लड़कियां खुद की देखभाल नहीं कर सकती. क्यों लड़कियों को कमजोर समझा जाता है. कनुप्रिया का मानना है लड़कियों के लिए ‘ड्रेस कोड, हॉस्टल समय और हर वक्त रोक- टोक करना अपमानजनक है. पंजाब यूनिवर्सिटी में इस चीज के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

फोटोग्राफी का है शौक

ग्रीनरी और नेचर लवर कनुप्रिया को फोटोग्राफी का भी शौक है. कनुप्रिया यूनिवर्सिटी कैंपस को बहुत पसंद करती हैं. यहां पर इनकी फेवरेट जगह इनका हॉस्टल है जहां पर इनके पास मिनी-जंगल भी है. इनके साथ ही कैंपस में कई ऐसी जगह भी है जो इनके फोटोग्राफी के शौक को जिन्दा रखती है.

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स्टूडेंट्स की जीत हुई

पंजाब यूनिवर्सिटी का चुनाव हो गया, कनुप्रिया जीत गई. पर ये जीत सिर्फ इनकी जीत नहीं है. यह छात्रों के बीच पनपे एक आंदोलन की जीत दिखाई देती है. कनुप्रिया मानतीं हैं ये उन मुद्दों की जीत लगती है, जिनके साथ एक प्रत्याशी जीता, हो सकता है इस जगह कोई लड़का लड़ता तो वह भी जीत जाता.’ क्योंकि जो बात हम कर रहे थे, उसकी जीत पक्की थी.

सिर्फ अच्छे नंबर के लिए साइंस बैकग्राउंड, फ्यूचर कुछ और

कनुप्रिया साइंस बैकग्राउंड की लड़की हैं. बीएससी जुलॉजी में किया और अब इसी विषय में पोस्टग्रेडुएशन कर रही हैं. लेकिन इस विषय को वो अपने करियर के तौर पर नहीं देखती. वो इसे सिर्फ एक विषय के हिसाब से पढ़तीं है, जितना इंतहाम और अच्छे नंबरों के लिए हो सकता है. फ्यूचर की बात करें तो कनुप्रिया का कहना है कि उन्हें अपने फ्यूचर में कुछ और दिखाई देता है, जो अभी पूरी तरह से साफ़ नहीं है. इनका मानना है कि देश में साफ़ राजनीति हो, गांव, कस्बे और दुनियाभर की गुटबाजी के नाम पर वोट न मांगा जाए. वोट मांगा जाए बेहतर दुनिया के सपने के नाम पर और आगे बढ़ती नौजवान पीढ़ी के नाम पर और उन सब बातों के नाम पर जिनका हमारी जिंदगी से लेना देना हो.

कैंपस के ही नहीं पूरे पंजाब के यूथ को भी रखना है नशे से दूर

नशे के मामले में कनुप्रिया का कहना है वह ये देखकर हैरान रह जाती हैं कि स्टूडेंट्स की दुनिया में शराब को नशा ही नहीं माना जा रहा. न जाने कौन-कौन से नशे स्टूडेंट्स के बीच फैल रहे हैं और कॉलेज, यूनिवर्सिटी तक आ गए हैं. इन सबसे लड़ना चाहिए.

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जनता की राजनीति करने वाली लड़की

एक बात तो तय है कि कनुप्रिया उन लड़कियों में से नहीं हैं, जो करियर बनाने के लिए एक डिग्री लेती हैं जिस डिग्री से नौकरी हासिल की जाती है. एक नॉनपॉलिटिकल बैकग्राउंड से ताल्लुक रखने वाली कनुप्रिया का मानना है कि यूनिवर्सिटी के बाहर की दुनिया अलग है. वहां स्थापित राजनैतिक दल हैं. वहां इस तरह की प्रगतिशीलता की राजनीति कितनी कामयाब हो सकती है कहना कठिन है. उनका रास्ता सत्ता या चुनाव की राजनीति वाला शायद न हो, लेकिन जनता की राजनीति जरूर करेंगी. इस फील्ड में बहुत से लोग पहले से ऐसा करते रहे हैं.

“इंकलाब जिंदाबाद” के बोल आज भी कायम

कनुप्रिया का कोई भी राजनैतिक आदर्श नहीं है. लेकिन भगत सिंह और करतार सिंह इन्हें प्रेरणा देते हैं. कनुप्रिया एक ऐसी लड़की है जो प्रेरणा में यकीन करती हैं, न कि आदर्शों को मूर्ति की तरह पूजने में. जनता के मुद्दों को उठाना, किसानों के लिए काम करना, मजदूरों की समस्याओं को समझना, अपने वक्त से मुठभेड़ करना, हर जागे हुए इंसान का फर्ज है.

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