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सूर्योपासना का महापर्व…. छठ पूजा

जानिए क्या है छठ पूजा का महत्तव, विधि और मान्यता

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Chhath

छठ मईया की महिमा,जाने सकल जहान।

लाल पावे” जे पूजे, सदा करी कल्याण। …..

कार्तिक महीने में मनाई जाने वाली छठ पूजा का बेहद महत्व है. छठ पूजा भगवान सूर्य को समर्पित है. कहते हैं सृष्टि की देवी प्रकृति ने खुद को 6 बागों में बांट रखा है. इनके छठे अंश को मातृदेवी यानी छठी देवी के रुप में पूजा जाता है. ये ब्रम्हा की मानस पुत्री हैं. छठ प्रकृति से जुड़ा हुआ एक ऐसा महापर्व है जिसे अमीर-गरीब के भेद से परे सामूहिकता का उत्सव कहा जाता है. इस उत्सव में श्रध्दा ही सर्वोपरि है. यहां समूह ही पंडित है, समूह ही जजमान. यह शायद एकमात्र ऐसा पर्व है जिसे मनाने के लिए न तो किसी मंदिर की जरुरत होती है, न ही पंडित की और न ही किसी प्रतिमा की. यह ईश्वर और आस्था के बीच सीधे संवाद का व्रत है. कोई धर्म ग्रंथ नहीं, कोई मंत्र नहीं, बस हमारी श्रद्धा और आराध्य.

यह पर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता था. पर आज इस व्रत ने महापर्व का रूप ले लिया है और भारत के कई हिस्सों में इस व्रत का प्रचलन है. तो आइए जानते हैं इस महापर्व के बारे में-

इन्हें कहा गया छठी मैया:

छठ मैया को ही स्‍थानीय बोली में षष्‍ठी देवी कहते हैं. षष्‍ठी देवी को ब्रह्मा की मानसपुत्री भी कहा गया है, जो नि:संतानों को संतान देती हैं, संतान को दीर्घायु प्रदान करती हैं. बच्चों की रक्षा करना भी इनका स्वाभाविक गुण धर्म है. इन्हें विष्णुमाया तथा बालदा यानी पुत्र देने वाली भी कहा गया है. कहा जाता है कि जन्म के छठे दिन जो छठी मनाई जाती है वो इन्हीं षष्ठी देवी की पूजा होती है. हिंदू पुराणों के अनुसार मां छठी को कात्यायनी नाम से भी जाना जाता है. नवरात्रि की षष्ठी तिथ‍ि को इन्‍हीं की पूजा की जाती है.

Chhath Parv

ऐसे मनाते हैं छठ पर्व:

यह पर्व चार दिनों का होता है. भैयादूज के तीसरे दिन से इसकी शुरुआत होती है. पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है. अगले दिन से उपवास आरम्भ होता है. इस उत्सव में जो व्यक्ति व्रत करता है वो दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब ७ बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं. जिसे खरना कहते हैं.

तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं. अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं. पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्जित होता है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं. अंत में लोगो को पूजा का प्रसाद दिया जाता है.

इस उत्सव को चार चरण में मनाते हैं-

नहाय खाय

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है. इसके बाद छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने भोजन खा कर व्रत की शुरुआत करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रति यानी व्रत करने वाले के भोजन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. यह दाल चने की होती है.

Thekua
ठेकुआ
लोहंडा और खरना

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है.

संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं. इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है.

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग सूर्य को अर्घ्य देने घाट पर जाते हैं. सभी छठव्रति एक तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते है. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है; इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले जैसा दृश्य बन जाता है.

छठ पूजा

उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रति इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया को दुबारा से दोहराते हैं. सभी व्रति तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं, व्रति घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं. पूजा के बाद व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं.

छठ पूजा की मान्यता

भारत में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ. वैसे सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है. यह उत्सव साल में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है. स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं. छठ पूजा कैसे शुरू हुई इसके बारे में कई मान्यताएं प्रचलित है.

१. प्रियव्रत जो पहले मनु माने जाते हैं, इनकी कोई संतान नहीं थी. प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा तो महर्षि ने उन्हें यज्ञ करने को कहा. इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन यह वह मृत पैदा हुआ. तभी देव लोक से ब्रह्मा की मानस पुत्री प्रगट हुईं जिन्होंने अपने स्पर्श से मरे हुए बेटे को जीवित कर दिया. तब महाराज प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की. देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो. तब राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की.

Chhath Lady

२. मान्यता के अनुसार किंदम ऋषि की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती के साथ वन में भटक रहे थे. तब उन दिनों उन्हें पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती संग सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की. इससे कुंती पुत्रवती हुई. इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का बड़ा महत्व है.

३. पर्व के बारे में यह धारणा है कि यह मुख्य रूप से बिहारवासियों का पर्व है. इसके पीछे कारण यह है कि इस पर्व की शुरुआत अंगराज कर्ण से हुई थी. अंग प्रदेश वर्तमान भागलपुर में है जो बिहार में स्थित है. अंगराज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देव की संतान है. कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानते थे. अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे. धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया.

४. छठ पर्व में सूर्य की पूजा का संबंध भगवान राम से भी माना जाता है. दीपावली के छठे दिन भगवान राम ने सीता संग अपने कुल देवता सूर्य की पूजा सरयू नदी में की थी. भगवान राम ने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया. सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया. इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया. इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे.

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